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???? कुत्तों के काटने की बढ़ती घटनाएं गंभीर चेतावनी

by Newslineexpres@1

???? पिंजौर में मासूम पर हमला: जिम्मेदार कौन?

(चंडीगढ़) पिंजौर में एक स्कूली बच्चे पर आवारा कुत्ते द्वारा आज किए गए हमले ने एक बार फिर हमारी व्यवस्था, प्रशासनिक ढांचे और सामाजिक संवेदनशीलता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घायल बच्चा अस्पताल में उपचाराधीन है, लेकिन यह घटना पूरे समाज के लिए एक गंभीर चेतावनी बनकर सामने आई है।
यह कोई पहली घटना नहीं है। देशभर में आवारा कुत्तों के हमले लगातार बढ़ रहे हैं। खासकर बच्चों और बुजुर्गों के लिए यह खतरा और भी गंभीर होता जा रहा है। इसके बावजूद ठोस और स्थायी समाधान की दिशा में प्रयास नाकाफी ही नजर आते हैं।

सरकार की भूमिका पर सवाल

ऐसी घटनाओं के बाद अक्सर सरकार और प्रशासन हरकत में आते हैं, लेकिन समय बीतते ही मामला फिर ठंडे बस्ते में चला जाता है। नगर निकायों की जिम्मेदारी है कि वे आवारा कुत्तों की संख्या पर नियंत्रण रखें और टीकाकरण व नसबंदी कार्यक्रम को प्रभावी ढंग से लागू करें।
बड़े स्तर पर योजनाएं चलने और भारी धनराशि खर्च होने के दावे जरूर किए जाते हैं, लेकिन जमीनी सच्चाई यह है कि इन योजनाओं का असर सीमित ही दिखाई देता है।

सवाल उठता है—आखिर कमी कहां है, नीति में या उसके क्रियान्वयन में?

कहाँ हैं मानवाधिकार संगठन और पशु प्रेमी संस्थाएं?

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग और विभिन्न पशु प्रेमी संस्थाएं अक्सर जानवरों के अधिकारों की वकालत करती हैं, जो कि एक संवेदनशील समाज के लिए आवश्यक भी है।
लेकिन जब इंसानी जान खतरे में पड़ती है, तब संतुलन की जरूरत और अधिक बढ़ जाती है। क्या इन संस्थाओं की जिम्मेदारी नहीं बनती कि वे ऐसी घटनाओं पर भी उतनी ही गंभीरता से प्रतिक्रिया दें? मानव जीवन की सुरक्षा सर्वोपरि होनी चाहिए, और इसके साथ ही पशु कल्याण का संतुलित समाधान भी जरूरी है।

समाज की भी जिम्मेदारी

सिर्फ सरकार को दोष देना पर्याप्त नहीं है। समाज के रूप में हमें भी अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी।
  अक्सर लोग आवारा कुत्तों को भोजन तो उपलब्ध कराते हैं, लेकिन उनकी देखरेख, टीकाकरण या नियंत्रण के लिए कोई ठोस पहल नहीं करते। इससे न केवल कुत्तों की संख्या बढ़ती है, बल्कि कई बार उनका व्यवहार भी आक्रामक हो जाता है।
सह-अस्तित्व का अर्थ केवल सहानुभूति नहीं, बल्कि जिम्मेदारी भी है।

समाधान क्या है?

समस्या का समाधान केवल भावनात्मक प्रतिक्रियाओं से नहीं, बल्कि ठोस नीति और सख्त क्रियान्वयन से ही संभव है।
व्यापक स्तर पर नसबंदी और टीकाकरण अभियान की वास्तविक निगरानी हो
स्कूलों, पार्कों और रिहायशी इलाकों के आसपास विशेष सुरक्षा व्यवस्था की जाए
नगर निकायों की स्पष्ट जवाबदेही तय की जाए।
पशु प्रेमियों और प्रशासन के बीच समन्वय स्थापित किया जाए
खर्च किए गए धन का पारदर्शी ऑडिट हो, ताकि परिणाम भी सामने आएं।

गंभीर चेतावनी :

पिंजौर की यह घटना एक गंभीर चेतावनी है। यदि अब भी ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो ऐसी घटनाएं भविष्य में और बढ़ सकती हैं।
जरूरत है कि सरकार, प्रशासन, मानवाधिकार संगठन और समाज सेवी संस्थाएं मिलकर एक संतुलित, संवेदनशील और प्रभावी समाधान निकालें, ताकि न तो इंसानों की जान खतरे में पड़े और न ही जानवरों के साथ क्रूरता हो।
आखिरकार, एक सभ्य समाज वही है जहां इंसान और पशु — दोनों सुरक्षित और सम्मानजनक जीवन जी सकें।
– अशोक वर्मा –
(लेखक एवं सीनियर पत्रकार, राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित शख्सियत है)   Newsline Express

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