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संपादकीय : बेअदबी पर सख्त कानून या सिर्फ राजनीतिक दांव ? सम्मान हर धर्म के लिए ज़रूरी !

by Newslineexpres@1

संपादकीय :
🚩 बेअदबी पर सख्त कानून या सिर्फ राजनीतिक दांव?

🚩सम्मान हर धर्म के लिए ज़रूरी !

पंजाब में बेअदबी के मामले कोई नए नहीं हैं। हर बार घटना होती है, गुस्सा उबाल खाता है, राजनीतिक बयान आते हैं और फिर कुछ समय बाद सब कुछ ठंडा पड़ जाता है। अब एक बार फिर सरकार सख्त सज़ाओं वाला संशोधन विधेयक लेकर आ रही है। लेकिन सवाल सीधा है — क्या यह सचमुच न्याय के लिए कदम है या फिर सिर्फ लोगों की भावनाओं को शांत करने का एक और तरीका?
10 साल से उम्रकैद तक की सज़ा का प्रावधान सुनने में काफ़ी सख्त लगता है। लेकिन क्या पिछले मामलों में दोषियों को सज़ा मिली? कितने केस ऐसे हैं जो अभी भी जांच और अदालतों में अटके पड़े हैं? अगर अमल ही कमजोर है, तो नए कानून की सख्ती सिर्फ कागज़ों तक ही सीमित रह जाएगी।
सच्चाई यह है कि पंजाब में कानून बनाना आसान है, लेकिन उसे ईमानदारी से लागू करना सबसे बड़ी कसौटी है। जब तक पुलिस जांच तेज नहीं होती और दोषियों को समय पर सज़ा नहीं मिलती, तब तक कोई भी कानून लोगों का भरोसा नहीं जीत सकता।
एक और गंभीर चिंता यह भी है कि ऐसे संवेदनशील मुद्दों का कई बार राजनीतिक लाभ के लिए इस्तेमाल किया जाता है। धार्मिक भावनाओं से खेलना सबसे आसान रास्ता है, लेकिन यह समाज को बांटने का सबसे खतरनाक तरीका भी है। क्या यह विधेयक सचमुच इंसाफ के लिए है या फिर सिर्फ एक राजनीतिक संदेश देने के लिए?
“अगर कानून सचमुच न्याय के लिए बनाया जा रहा है, तो यह सवाल टाला नहीं जा सकता कि क्या यह सख्ती सिर्फ एक धर्म के लिए है या हर धर्म के लिए? क्या हिंदू धर्म, सिख धर्म और अन्य सभी धर्मों के पवित्र ग्रंथों के लिए समान सम्मान और कानूनी सुरक्षा होगी या नहीं?”
इसके अलावा, सख्त कानूनों के दुरुपयोग का खतरा भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। अगर बिना पूरी जांच के कार्रवाई होगी, तो निर्दोष लोग भी इसकी चपेट में आ सकते हैं। ऐसे में यह कानून न्याय का साधन बनने के बजाय दबाव का हथियार भी बन सकता है।
अंत में बात साफ है — लोगों को सिर्फ सख्त कानून नहीं, बल्कि सख्त और निष्पक्ष कार्रवाई चाहिए। अगर सरकार सचमुच बेअदबी के मामलों पर रोक लगाना चाहती है, तो उसे साबित करना होगा कि यह कदम सिर्फ कागज़ों तक सीमित नहीं, बल्कि ज़मीन पर भी दिखाई देगा। नहीं तो यह भी पिछले वादों की तरह एक और राजनीतिक नारा बनकर रह जाएगा।

संपादक : अशोक वर्मा
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